Anurag Srivastava
Lucknow, India
Anurag Srivastava
Lucknow, India
I don't think too much about it. I can do it the best and better is thinking again on it... Well body is average Mentally Psycho They call me Old School But what is the best I like what I am. Let the world say anything I just don't care... ----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------****************************************************************************************************************** मेरे पैराहन पर उनके आंसुओं के छींटे सूखते ही लाल जो होने लगे हमें क्या पता था कि बनती चट्टानों से टूटकर मिट्टी हम तो पत्थर, थे पिघलने लगे... जब भी देखा तो फूल ही लगे मगर हाथ जब भी बढाया कांटे ही चुभे दर्द चुभने का नहीं था हमें लहू तो तब बहा जब घाव फूलों ने दिए... हर बात पर मुस्कुरा कर आगे चले जाना आदत थी मगर उनके मिलने पर मुड़ने लगे दर्द पर भी आँखों को माना करते थे कि न देखें मगर ज़हन तो उन्ही के पास था न उनके होने पर भी... राहें धुंध से भरी थी मेरी मगर मंजिलें नज़र में थीं थक कर चूर होने किचाहत थी मेरी मगर हर कदम एक नयी उम्मीद राह देती थी... गहरी थी गम की नज़रें मुझ पर मगर मैं भी क्म न था अपनी हर हर पर खुशियाँ मनाता गया मुझसे जलने वालों का कुफ्र कुछ कमतर ही लगा... चिराग के बुझ जाने के बाद का सवेरा थे वो सारे मैंने खुद को आग बना लिया वो सारे थे अगर जमीन पर बिखरे सितारे मैंने खुद शामियाने बिखरी जारी बना लिया... शामिल नहीं हम उनकी महफ़िल में तो क्या हमारे खयालों में तो उनका आना जाना है हाँ माना की वो जन्नत के बाशिंदे हैं मगर हमारे ख्वाबों में आज भी उनका ज़मीं पर आना है... उनसे हर रिश्ता मेरा टूटा है ये तो मानते है हम भी मगर तार अब भी जुड़े हैं धडकनों के उनसे सांसें नहीं दर्मियां ये जानते हैं हम भी मगर मेरे आंसुओं का रिश्ता अज भी है उनसे... xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxoxoxoxoxoxoxxooxooxooxoxoxoxoxooxoxoxooxoxoooxooxoxooxoxoxooxoxoxoxooxoxoxoooxoxooxoxooxoxoxooxoxoxoxoxoxooxoxoxo मैं कब कहता हूं जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने, मैं कब कहता हूं जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने ? कांटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है मैं कब कहता हूं वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने ? मैं कब कहता हूं मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले ? मैं कब कहता हूं प्यार करूं तो मुझे प्राप्ति की ओट मिले ? मैं कब कहता हूं विजय करूं मेरा ऊंचा प्रासाद बने ? या पात्र जगत की श्रद्धा की मेरी धुंधली-सी याद बने ? पथ मेरा रहे प्रशस्त सदा क्यों विकल करे यह चाह मुझे ? नेतृत्व न मेरा छिन जावे क्यों इसकी हो परवाह मुझे ? मैं प्रस्तुत हूं चाहे मिट्टी जनपद की धूल बने — फिर उस धूली का कण-कण भी मेरा गतिरोधक शूल बने ! अपने जीवन का रस देकर जिसको यत्नों से पाला है — क्या वह केवल अवसाद-मलिन झरते आँसू की माला है ? वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला है वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहन कारी हाला है । मैंने विदग्ध हो जान लिया, अन्तिम रहस्य पहचान लिया — मैंने आहुति बन कर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है ! मैं कहता हूं, मैं बढ़ता हूं, मैं नभ की चोटी चढ़ता हूं कुचला जाकर भी धूली-सा आंधी-सा और उमड़ता हूं । मेरा जीवन ललकार बने, असफलता ही असि-धार बने इस निर्मम रण में पग-पग का रुकना ही मेरा वार बने ! भव सारा तुझको है स्वाहा सब कुछ तप कर अंगार बने — तेरी पुकार-सा दुर्निवार मेरा यह नीरव प्यार बने । -अज्ञेय