अभिनव शुक्ल
टूटी फूटी रचनायें करते हुए ही मंच मिल गए तो अपने आप को कवि समझने लगे. जब वास्तविकता खुली तो लगा कि कितने भुलावे में थे. कभी कभी लगता है, काश भुलावों में ही पूरा जीवन कट जाता तो कितना अच्छा रहता. इन्हीं भुलावों की रस्साकशी जब हकीक़त के साथ होती है तो कभी कभी कुछ लिख जाता है.