Ravi Kumar Keshri

में एक आम इन्सान हूं...
मैं कम बोलता हूं, पर कुछ लोग कहते हैं कि
जब मैं बोलता हूं तो बहुत बोलता हूं.
मुझे लगता है कि मैं ज्यादा सोचता हूं

थोड़ा सा विद्रोही...परम्परायें तोड़ना चाहता हूं .

दोस्तॊं से दोस्ती तो हर कोई निभाता है.. दुश्मनों को भी अपना दोस्त बनाना चाहता हूं,

जो हम उडे ऊचाई पे अकेले, तो क्या नया किया.. साथ मे हर किसी के पंख फ़ैलाना चाह्ता हूं,

सब को अपना कह सकूँ, ऐसा ठिकाना चाहता हूँ,
टूटे तारों को जोड़ कर, फिर आजमाना चाहता हूँ,

बिछुड़े जनों से स्नेह का, मंदिर बनाना चाहता हूँ.
हर अन्धेरे घर मे फिर, दीपक जलाना चाहता हूँ,

जब तक रहे ये जिन्दगी, खुशियाँ लुटाना चाहता हूँ,'