Kuldeep Sharma
Bhilwara
टूट सकता हूँ, मगर झुकना नहीं मंज़ूर है ! हाँ मैं ‘' ब्रह्म '’ हूँ, मुझे इस बात का ग़ुरूर है!! अहम है पश्चिम तुझे ???....चुटकी में तोड़ देंगे हम ! हुंकार भर जो उठ गए, तेरा घमंड चूर है!! सांसों में मेरी संस्कृति है, वेद बहते ख़ून में......................... पुराण-शास्त्र-उपनिषद, चेहरे का मेरे नूर है!!