महेश बारमाटे "माही"
Jabalpur
एक एहसास जो जागा था कभी उन दो अँखियों के वास्ते,
आज एक आगाज बन गया है...
आखिर तू है कहाँ ओ मेरे माही !
के देख तेरे बिन मैं भी एक शायर बन गया....
एक एहसास जो जागा था कभी उन दो अँखियों के वास्ते,
आज एक आगाज बन गया है...
आखिर तू है कहाँ ओ मेरे माही !
के देख तेरे बिन मैं भी एक शायर बन गया....