रोली अग्रवाल

Allahabad

सांसों की तरह यदि हिंदी भी मन और मस्तिष्क में प्रवाहित होती रहे, तो औरों का पता नहीं, लेकिन सवेरे की चाय और रात की नींद मुझे अच्छी लगती है I

महीनों से बंद पड़े दिमाग के धरातल को साफ़ और फिर से चालू करने की मुहीम का ही एक हिस्सा है "बौड़म बस्ती"I

आपके दिमाग का भी जंक साफ़ करेगा ये तो नहीं कह सकती, लेकिन एक बार आँखें फिराने लायक होगा, ऐसा लिखने का भरसक प्रयास होगा बौड़म बस्ती द्वारा I

आशा करती हूँ मेरे नौसिखियेपन को भी आप अपनी सवेरे की नित्य क्रिया की भांति रोज़मर्रा में शामिल करेंगे I