दिन सोमवार का था दोपहर के १:५३ हो रहे थे. खडवा गाँव के किरस्तानी Hospital में पहली बार रोने की गुस्ताखी की थी.मुझे पता नही था की उस गुस्ताखी की सजा ये होगी की स्कूली सीढियां चढ़ के बड़े कालेजों की चकाचौंध देख, पेट को भरने के लिए रोटियां Multinational Company या National कंपनियों के तवे पे सेंकनी होंगी.