विशुद्ध चैतन्य

Deoghar, Jharkhand, India

ज़िन्दगी में जब हर कोई बेगाना होने लगता है, हर चेहरा अनजाना लगने लगता है तो व्यक्ति समझौता करने लगता है | मैं नहीं कर पाया समझौता और अपने लिए चुन लिया वह राह जिसकी मंजिल का कोई पता नहीं था | जिसमें ठोकरें और अँधेरे ही थे | जहाँ हर कोई अपना था और कोई भी अपना नहीं था | यह राह था गुमनामी का | कहीं खो जाने का | अपना आस्तित्व की समाधि का | आज जो कुछ भी मैं कर रहा हूँ उसमें मेरा अपना योगदान उतना ही जितना सागर में बहते तिनके का | क्योंकि जो कुछ भी मैं कर रहा हूँ या लोग समझते हैं मैंने किया है वह सब भ्रम में हैं | मैंने अपने जीवन के शुरू के ३० वर्ष अवश्य मेहनत की सफलता और वह सारी खुशियाँ पाने की जो हर व्यक्ति चाहता है | मैंने भौतिक सुख तो पाया लेकिन किसी ऐसे ख़ास को नहीं ढूंढ पाया जिसे मैं अपना कह पाता | इसलिए मेरा यह भ्रम टूट गया कि मेहनत से ही सफलता प्राप्त होती है | मैंने इस सिद्धांत के विरुद्ध चलना शुरू किया और हर वह चीज जो मैंने मेहनत से हासिल किया बर्बाद करता चला गया | और फिर एक वक्त ऐसा आया कि मैं सड़क पर आ गया | और यहीं से मेरा नया जीवन आरम्भ हुआ अकर्मण्यता का | मिल गया तो खा लिया, नहीं मिला तो न सही | किसी से अब कोई शिकायत नहीं | आज मुझे दुनिया की कोई भी उपलब्धि हासिल हो जाए मेरे लिए उसका कोई मोल नहीं क्योंकि जब मैंने चाहा मुझे नहीं मिला |

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